पिता

आज मैं वक़्त के उस पायदान पर खड़ा हूँ
जहा से रिश्तों की परख हो चली है मुझे
वक़्त और ज़माने के तकाजे को समझा
और झेला है मैंने।

पीछे मुड कर देखता हूँ, तो सोचता हूँ
कितना निस्वार्थ था,मै
अपनों का और बच्चों का ही सोचा,
पर क्या इसी बात का हर्जाना है ये
की उनके साथ दो पल बैठने और बोलने
को तरसता हूँ मैं

उनकी हर ख्वाइश को पूरा करते करते
आज उनसे कुछ मांगने में भी झिझक होती है
उन्हें चलना,बोलना,हँसना हमने सिखाया
फिर आज,सलाह देने से भी डरता हूँ मैं।

जीवन भर इतना करके,सुनता हूँ
कोई एहसान नहीं किया…ये तो फ़र्ज़ था आपका
आज हैरत भरी निगाहो से पूछता हूँ उन बच्चों से

तुम्हारे फ़र्ज़ निभाने का समय कब आएगा

इस उम्र के पायदान पर खड़ा,बस यही सोचता हूँ

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