पिता के रिटायरमेंट पर कविता


परिवार के चेहरे पे ये जो मुस्कान बस्ती है
पिता ही है जिसमें सबकी जान बस्ती है

मां यदि घर है तो पिता उस घर की नींव है
वो पिता ही है जो नीम के पेड़ सदृश सब मर्जो के हकीम है

पिता कमाते है घर चलाते है, सारी जिममेदारियां
हंस कर निभाते है

बचपन में बच्चो के लिए घोड़ा बनने वाले
बुढ़ापे तक नाती, पोते की काठी चलाते है

पिता एक रिश्ता नहीं, एक शब्द नहीं, एक एहसास नहीं
परन्तु एक जोश है, वह पाषाण है जो सिखाते है
निडर बनो बच्चो कभी मत डरो।

तुम मेरा प्रतिबिंब हो
चलना सीखो, गिरना सीखो
पर उससे पहले सीखना सीखो

ये जीवन कांटो का तब है, जब तुम डर गए
तो हर पल लड़ना सीखो

जीवन बहुत सुंदर है,उसे महसूस करो
खुश रहो और खुश रखना सीखो

रिटायर महज एक शब्द है पिता के लिए
ये तो घर में लगी वो main ghadi है जो रुक जाए तो
फिर परिवार का हर मिनट सेकंड थम जाएं।

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