मंदिर में जाने के अदभुत लाभ?

मंदिर का अर्थ है मन से दूर कोई स्थान। मंदिर जहां देवी   देवताओं की मूर्तियां प्रतिष्ठित की जाती है। जहां सभी लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए जाते हैं। मंदिर हमारे लिए आस्था का प्रतीक है। मंदिर को देखकर हमारे मन में स्वत ही श्रद्धा जागृत हो जाती है।

मंदिर कौन – कौन जा सकता है

वह व्यक्ति मंदिर जाता है, जिसे भगवान में गहन आस्था हो और जिस पर ईश्वरीय कृपा हो। बिना प्रभु की इच्छा के आप मंदिर नहीं जा सकते। आपने कई लोगो से सुना होगा की वे शिरडी जाना चाहते हैं या वैष्णो देवी जाना चाहते है पर बुलावा नहीं आता। यह बात 100 फीसदी सच है।

जो लोग संसार में सिर्फ अपने लिए नहीं अपितु दूसरों के लिए भी जीते है । सबके लिए उनके मन में प्रेम, समर्पण और सद्भाव होता है। वे सदैव प्रभु के प्रिय होते है और उन्हें हमेशा भगवान का प्रेम प्राप्त होता है।

जिन लोगो को मंदिर देखकर भी उसमे प्रवेश करने की इच्छा जागृत नहीं होती या श्रद्धा भाव उत्पन्न नहीं होता।
वे लोग मंदिर नहीं जा पाते। पूर्व जन्म के पाप संस्कारो के कारण वे नास्तिक ही रहते है और प्रभु की कृपा से वंचित।

जो लोग लोभी, दुराचारी, स्वार्थी और कृतघ्न होते हैं, उन्हें ईश्वर कभी अपने पास नहीं बुलाते। 

भागवत गीता में कहा गया है – जैसा भाव रहे जिस जन का वैसा भाव हुआ मेरे मन का। प्रभु तो भक्तो के अधीन होते है और जहां प्रभु में विश्वास ही नहीं हो वहां भगवान नहीं जाते ना ही ऐसे व्यक्ति को वे अपने पास बुलाते हैं।

मंदिर में जाने के अदभुत लाभ –

मंदिर में होनेवाले शंखनाद, घंटे और मंत्रो के उच्चारण से मन में  सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मंदिर में मानसिक और शरीरिक शांति का सुखद अनुभव होता है। प्रभु के समीप होने से कई प्रकार की चिंताओं से मुक्ति मिलती है।

कितना ही नकारात्मक और नास्तिक व्यक्ति हो वहां  जाकर सकारात्मक हो ही जाता है। मंदिर में धूप, दीप और सुगंधित वातावरण से चित्त को शांति और सुकून मिलता है। अन्य विकार जैसे दूसरों से घृणा, ईर्ष्या, वैमनस्य भी समाप्त हो जाता है।

मंदिर बनाने के पीछे वैज्ञानिक कारण

मंदिरों का निर्माण पूरी तरह वैज्ञानिक है। मंदिर का वास्तुशिल्प ऐसा बनाया जाता है, जिससे वहां शांति और दिव्यता रहे। 
मंदिर की वह छत जिसके नीचे मूर्ति की स्थापना की जाती है, ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। जिसे गुंबद कहा जाता है। गुंबद के शिखर के केंद्र बिंदु के ठीक नीचे मूर्ति स्थापित होती है। गुंबद तथा मूर्ति का मध्य केंद्र एक रखा जाता है।

गुंबद के कारण मंदिर मेे मंत्रोच्चारण के स्वर और अन्य ध्वनियां गूंजती है तथा वहां उपस्थित व्यक्ति को प्रभावित करती है। गुंबद और मूर्ति का मध्य केंद्र एक ही होने से मूर्ति में लगातार ऊर्जा प्रवाहित होती है। जो सभी को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

मंदिर में बजने वाले शंख और घंटों की ध्वनियां वहां के वातावरण को शुद्ध करती है। ऐसा माना जाता है की उस आवाज़ की तरंगों से कीटाणु भी खतम हो जाते हैं।

मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होने से हम अनजाने ही योग और व्यायाम की सामान्य विधियां पूरी कर लेते हैं। इससे हमारे मानसिक तनाव, शारीरिक थकावट, आलस दूर हो जाते हैं। हमारी एकाग्रता बढ़ती है।

हमें अपने अंदर की शक्तियों को जगाने के लिए नियमित रूप से मंदिर जाना चाहिए। प्रभु को हर दिन धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि उनकी ही कृपा से हमें हर मुसीबत से मुक्ति मिलती है।

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