मां पर सुंदर रचना


मां वह पहला शब्द, जो बोल, बच्चे बोलना सीखते
उसके आंचल की छाया में, वह हर दिन बढ़ते और खिलते

बचपन से जवानी तक हर बात बच्चे की मां सुनती है
खेले – कुदे, खिलौने दिलाए, हर ख्वाहिश उसकी पूरी करती है

जो खुद गीले में सो कर भी बच्चे को हर पल सूखा रखे
वो मां ही है जो खुद भूखी रह कर बच्चे का पेट भरे

खुद गर्मी में सोकर बच्चे को ठंडी हवा करती है
वो मां ही है जो बच्चे के बीमार होने पर रोया करती है

कहीं नजर ना लगे मेरे बच्चे को, इस बात से वह डरती है
काला धागा, काला टीका, और सब टोटके करती है

उसके पहली बार चलने पर जैसे मानो मां का मान बढ़े
जो वो पढ़ने – लिखने लगे तो मां की खुशियो को पंख लगे

मां की खुशियां हो जाए दोगुनी जब बच्चे की नौकरी लगे
बस जाएं प्यारा सा संसार यही हर मां की कामना रहे

कुछ कमी ना रह जाए परवरिश में दिन रात काम में लगी रहे
वो मां ही है जिसके बिना, घर में किसी का काम ना चले

टिक टिक घड़ी सी दिनभर मां दौड़ा करती है
कहीं रह ना जाए कोई काम अधूरा, बस इसीलिए वह कभी नहीं थकती है

खुद के लिए कभी उसने जीवन में कभी छुट्टी ना ली
पर जब सुनती है बच्चो से, तुमसे मिलने को छुट्टी ना मिली
तो रोती है, जार – जार वह सोच कर बस यही
क्या मेरे अपने बच्चो पर इतना भी मेरा हक नहीं

पूरा जीवन अपना बच्चो को देना क्या मां का गलत हुआ
जब दो पल बच्चो के साथ बिताने को मां पल – पल तरसती है।

क्यों मां खुदगर्जी से जीया ना करती है,

अपना पूरा जीवन बच्चो को समर्पित करती है

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