मेरी हर नज़्म में तुम हो

ज़िन्दगी को संवार दे तू मेरा ख्वाब बनके
मेरी हर नज़्म में बस तेरी ही गुफ्तगू हो
दूर जब हो तो तेरी याद में
मै काटू हर पल तेरे ही इंतज़ार में

मेरे हर पल में तू ही है शामिल
जो गर रूह से पूछो तो तेरा ही नाम ले
मेरे हमसफ़र मेरी ग़ज़ल भी तू
तुझे पढ़ता रहूं हर पल यही चाहूं

तुझ बिन सोच ना सकू वो पल भी तू
तू ही इंतेहा और आरज़ू मेरी
तेरे होने से मै ज़ह नसीब हूं
तुझ बिन मै कहीं गुम ही सा हूं

मेरी राहे तेरे दरवाज़े पर
दस्तके रोज ही दिया करती
मेरी तमन्ना तो हर पल तेरा दीदार है
तेरा तस्सवुर ही मेरी आशिक़ी
तेरा हुस्न आफरीन आफरीन!!


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